चुनाव

करियर के आखिरी दिन गिन रहे हैं नीतीश कुमार?

बिहार की राजनीति वो ऊंट है जिसके बारे में नहीं बताया जा सकता कि किस करवट बैठेगा…

लोकसभा चुनाव में ज़्यादा वक्त नहीं बचा है और अब एक बार फिर कयासबाज़ियों का मौसम शुरू हो गया। सबसे ज़्यादा भविष्यवाणियां नीतीश कुमार को लेकर हो रही हैं। उनके पिछले रिकॉर्ड को देखकर कोई पक्के तौर पर नहीं कह पा रहा कि वो किसके साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। नीतीश बीजेपी के दोस्त, फिर दुश्मन और अब फिर से दोस्त हैं। बावजूद इसके उनके तेवर दोस्त के कम, दुश्मन जैसे ज़्यादा नज़र आ रहे हैं। वो दिल्ली में पहली बार अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक कर रहे हैं मगर पूरे दौरे के बीच पीएम या अपनी सहयोगी पार्टी के अध्यक्ष से मिलने का वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं। राजनीति समझने वालों के लिए इसमें कई खुले और छिपे संकेत हैं। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 22 पर कब्ज़ा जमाए बैठी बीजेपी कभी नहीं चाहेगी कि जेडीयू सूबे में अब बड़े भाई वाली हैसियत पा सके। जेडीयू के पास फिलहाल 2 ही सीटें हैं। उससे ज़्यादा 6 सीटें एनडीए में शामिल बिहार की ही एक और ताकतवर पार्टी लोजपा के रामविलास पासवान के पास हैं। उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी के पास 3 सीटें हैं। ऐसे समीकरणों के बीच नीतीश की जुगत है कि वो अपनी पार्टी जेडीयू के लिए लोकसभा चुनाव में लड़ने के लिए 15 सीटों पर बीजेपी से सहमति पा लें। हाल-फिलहाल की स्थिति देखकर तो ऐसा मुश्किल लग रहा है। स्थिति मुश्किल है इसलिए नीतीश कुमार ने बिहार को स्पेशल स्टेटस की मांग को उठाना शुरू कर दिया है। ये बिलकुल वैसी ही मांग है जैसी टीडीपी उठाकर एनडीए से अलग हो चुकी है। टीडीपी को जेडीयू का समर्थन किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में नीतीश कुमार की ये मांग एनडीए के कुनबे से अलग होने की भूमिका के रूप में भी देखी जा रही है। इससे अलग देखें तो पाएंगे कि जेडीयू के प्रवक्ता दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर केजरीवाल के साथ नज़र आते हैं तो साथ ही किसानों के मु्द्दे पर भी वो मोदी सरकार का बचाव करते कभी नहीं देखे गए। ज़ाहिर है, अमित शाह से कुछ छिपा नहीं है। अपने बूते बिहार की सत्ता कब्ज़ाने का सपना पाले बैठी बीजेपी भी मौके की तलाश ही में है।

दूसरी तरफ बिहार में कांग्रेस और आरजेडी हैं जिन्हें नीतीश कुमार धोखा दे चुके। कभी सेकुलर ताकतों के लाड़ले रहे नीतीश पर अब इनमें से कोई भरोसा करने को तैयार नहीं दिखता। कांग्रेस में सोनिया का दौर खत्म होने के बाद राहुल युग चल रहा है। राहुल के साथ नीतीश की पटरी कभी कोई खास नहीं बैठी। खुद राहुल युवा नेताओं के साथ ज़्यादा जोशोखरोश से मंच बांटते दिखते हैं। ऐसे में रिटायरमेंट की तरफ बढ़ते नीतीश को वो किस भरोेसे अपनी बगल में बैठाएंगे कहना कठिन है। वहीं, कांग्रेस ने अगर ऐसा किया तो उसे विश्वस्त सहयोगी आरजेडी के भी छिटकने का डर सताएगा। नीतीश कुमार ने पिछले दिनों जैसा तीखा हमला चारों तरफ से लालू परिवार पर बोला है उन हालात में अब जेडीयू और आरजेडी को साथ बैठा पाना राहुल के बूते तो नहीं दिखाई पड़ता। आजेडी की नई पीढ़ी भी अपने चाचा नीतीश से आरपार खेलने के मूड में ज़्यादा है, समझौते के कम। ऊपर से तेजस्वी यादव इतने सयाने तो हैं कि जान सकें बिहार की जनता से सहानुभूति वोट लेने का उनके पास सुनहरा मौका है। वो लोगों के बीच जाकर इस बात को भुना रहे हैं कि लालू के आशीर्वाद से सीएम बनने के बाद नीतीश ने उन्हें धोखा दे दिया,बीजेपी के साथ मिलकर पूरे यादव कुनबे को झूठे मुकदमों में फंसा दिया और उनके पिता को गंभीर बीमार होने के बावजूद जेल भिजवा दिया। तेजस्वी उस अपार समर्थन को नहीं भूले होंगे जो आरजेडी को लालू के जेल जाने के बाद पिछले विधानसभा चुनाव में मिला था। कोई वजह नहीं कि ये युवा नेता लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश के साथ मंच साझा करके उस हमदर्दी को खो दे जिसके बूते अच्छी खासी सीटें जीतने के समीकरण बन रहे हों।

उधर अकेले चुनाव लड़ना नीतीश के बस का तो नहीं दिखता। शरद यादव जैसे सहयोगी को खो चुकने के बाद, सेकुलरिज़्म की छतरी से छिटक जाने के बाद, दोनों ही खेमों को कई-कई बार छोड़ते रहने के बाद, किसी पुख्ता जातिगत वोट बैंक के अभाव से जूझने के बाद नीतीश कुमार के लिए सिर्फ सुशासन बाबू वाली छवि जीत के लिए नाकाफी होगी। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि मीडिया में एक वक्त के लिए छा गई ये छवि भी अब वैसी नहीं रह गई जैसी कभी थी।

ऐसे में लोकसभा चुनाव 2019 नीतीश कुमार के लिए करियर का खात्माकरनेवाले भी साबित हो सकते हैं। नीतीश अगले साल भर में थोड़े भी कमज़ोर पड़े तो अब बिहार में बीजेपी और तेजस्वी के पाले साफ-साफ दिखने लगेंगे। ऐसे में नीतीश का नेपथ्य में जाना स्वाभाविक बन जाएगा।

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