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43000 करोड़ के कर्ज की वजह से महंगा हुआ पेट्रोल और डीज़ल ?

पेट्रोल डीज़ल की आग लगाती कीमतें इस वक्त सरकार के लिए मुश्किल हालात पैदा कर रही हैं। लेकिन इसी बीच सोशल मीडिया पर पीएम मोदी और मौजूदा सरकार के बचाव में एक थ्योरी वायरल हो रही है । और ये थ्योरी है 43000 करोड़ के कर्ज़ की।

इस थ्योरी के मुताबिक ये दावा किया जा रहा है कि पुरानी सरकारों ने तेल खरीदने में देश को 43000 करोड़ के कर्जे में डूबो दिया था। अब मोदी जी किसी तरह ये 43000 करोड़ का कर्ज चुकाने में काफी मेहनत कर रहे हैं और इसीलिए फिलहाल पेट्रोल डीजल की कीमतें बढ़ी हैं। इस संदेश में ये भी कहा जा रहा है कि ये सब देशहित के लिए है और इसे लेकर बौखलाना नहीं चाहिए।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस थ्योंरी को काफी लोग शेयर भी कर रहे हैं। लेकिन हम आपको बताते हैं कि आखिर तेल की बढ़ती कीमतों के खेल और इस 43000 करोड़ के कर्ज के पीछे असल कहानी क्या है ?

दरअसल भारत अपने कच्‍चे तेल की ज़रूरतें पूरी करने के लिए सबसे ज्यादा सऊदी अरब पर निर्भर है. इसके बाद सबसे ज्यादा तेल ईरान और फिर इराक से आता है। चीन के बाद भारत ईरान का सबसे बड़ा कच्चा तेल का आयातक देश है। भारतीय तेल कम्पनियां जैसे कि हिन्दुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम, मेंगलुरु रिफाइनरी एण्ड पेट्रोकेमिकल लिमिटेड एवं इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ईरान से कच्‍चा तेल खरीदती है।

ईरान से खरीदे गए तेल का 55 फीसदी पैसा तुर्की के हल्कबैंक के जरिए पेमेंट किया जाता था। वहीं बाकी बची 45 फीसदी रकम भारत यूको बैंक के जरिए रुपये में ईरान को देता था। 2013 में अमेरिका ने ईरान पर और भी प्रतिबंध लगा दिए, जिसकी वजह से ईरान हल्कबैंक के जरिए भारत से पैसे नहीं ले पाया। नतीजा ये हुआ कि भारत की कंपनियों पर ईरान का कुल 6.4 बिलियन डॉलर यानि की लगभग 43000 करोड़ रूपए का बकाया हो गया।

अब भारत को इरान को पैसे चुकाने के लिए अब नए रास्ते खोजने थे। इसके लिए आगे आया रिजर्व बैंक। 2016 में जब पीएम मोदी ईरान के दौरे पर गए, तो उस वक्त बकाये की करीब 5000 करोड़ रुपये की किश्त चुका दी गई और धीरे-धीरे छह किश्तों में भारत ने ईरान के 43,000 करोड़ रुपये का कर्ज चुका दिया।

अब इसे ही मोदी सरकार की उपलब्धि के तौर पर गिनाया जा रहा है और कहा जा रहा है कि इसी 43000 करोड़ की रकम को मैनेज करने के चक्कर में सरकार को कीमतों पर थोड़ा सख्त होना पड़ा है। हालांकि आपको बता दें कि पेट्रोलियम प्रोडक्ट की कीमतें सरकार नहीं बल्कि पेट्रोलियम कंपनियां तय करती हैं। और फिलहाल बढ़ी पेट्रोल डीजल की कीमतों का उस 43000 करोड़ के कर्ज से कोई कनेक्शन नहीं है।

लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ लोग इन दोनों का कनेक्शन मिलाकर अपनी अलग अलग थ्य़ोरी साबित करने में जुटे हैं।

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